“राष्ट्रकवि” रामधारी सिंह दिनकर का काव्य सफ़र

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रामधारी सिंह दिनकर छायावादोत्तर युग के राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्यधारा के प्रमुख कवियों में से थे | इन्होंने अपने काव्य में ओजपूर्ण स्वर से राष्ट्र के प्राणों को नवीन चेतना प्रदान की | इन्होंने देश को सिर्फ तत्कालीन घटनओं, विषमतओं, यातनाओं और समताओं के रूप में नहीं, बल्कि आदर्श, आस्था और सांस्कृतिक परम्परा के रूप में भी जाना | 

विद्यार्थी जीवन से ही इनकी हिंदी काव्य के प्रति रूचि रही | जब इंटर में हिंदी विषय लेने के इच्छुक थे तब प्रध्यानापक ने मना कर दिया और उसके बाद जब बी. ए. में प्रधान विषय में हिंदी का चयन किया, तब उनके कॉलेज के प्रिंसिपल ने उन्हें कहा कि हिंदी भाषा का साहित्य बहुत दरिद्र है, इस साहित्य को प्रोत्साहन वो नहीं दे सकते | इस घटना ने दिनकर के हृदय को झकझोर दिया तथा हिंदी के प्रति ज्यादा प्रेमी बना दिया, तब उन्होंने निश्चय किया कि हिंदी में ही अपने विचारों का प्रचार करेंगे |  

इनका सेवाक्षेत्र हाईस्कूल के प्रध्यानापक से शुरू हुआ | ये प्रोफ़ेसर, एम. पी., व केंद्र सरकार के हिंदी के सलाहकार भी रहे | 

इनकी प्रारंभिक कविताएँ छायावाद से प्रेरित रही, बाद में छायावाद से यथार्थवाद की ओर भी आकर्षित हुए | इनकी कवितओं में प्रगतिवाद के स्वर देखने को भी मिलते हैं | स्वरों की विविधता होते हुए भी, इनका मुख्य स्वर राष्ट्रीयता का ही था | 

इन्होंने कहा राष्ट्रीयता मेरे व्यक्तित्व के भीतर से नहीं जन्मी, उसने बाहर से आकर मुझे आकृत किया है | कवि होने की सामर्थ्य शायद मुझमें नहीं थी, यह क्षमता मुझमें भारतवर्ष का ध्यान करने से जागृत हुई है | यही शक्ति भारतीय जनता की आकुलता को आत्मसात करने में दीप्त हुई |  

प्राचीन मूल्यों को नए जीवन संदर्भों से जोड़कर एक ओर उन्हें जीवांतता प्रदान की तो दूसरी ओर वर्तमान समस्याओं को महत्व देते हुए उन्हें अपने प्राचीन किन्तु जीवांत मूल्यों से भी जोड़ा | इनके काव्य में साम्यवाद की विनाशकारी मनोवृति व गांधीवाद की अहिंसात्मक रणनीति दोनों का समन्वय देखने को मिलता है | दिनकर के काव्य में क्रांति की भावना थी, क्रांति परिवर्तन की जिसने सामाजिक और राष्ट्रिय शुभकारी परिवर्तन में सहयोग किया |

राष्ट्रिय स्वर उनकी आत्मा का प्रधान स्वर रहा | इनका काव्य भारतीय संस्कृति सेओतप्रोत रहा, सामाजिकता और सामुदायिकता उनके काव्य के कण-कण में समायी है |

रामधारी सिंह दिनकर जी का साहित्य विशाल है, हम दिनकर जी की कुछ किताबों का संक्षेप दे रहे हैं जो आपको जरूर ही पढ़नी चाहिए |

रेणुका

रेणुका दिनकर का आरम्भिक काव्य है जो 1935 में प्रकाशित हुआ | रेणुका की प्रत्येक कविता प्रौढ़ता, परिपक़्वता और चारुता से परपूर्ण है | दिनकर जी की कविता में अदम्य तेज, पराक्रम व स्वदेश प्रेम पाएँगे | यह कविता क्रांति युग का सम्पूर्ण प्रतिनिधित्व करती है |

Renuka

रेणुका से प्रेम का सौदा कविता का एक अंश :-

सत्य का जिसके हृदय में प्यार हो,
एक पथ, बलि के लिए तैयार हो ।

फूँक दे सोचे बिना संसार को,
तोड़ दे मँझधार जा पतवार को ।

कुछ नई पैदा रगों में जाँ करे,
कुछ अजब पैदा नया तूफाँ करे।

हाँ, नईं दुनिया गढ़े अपने लिए,
रैन-दिन जागे मधुर सपने लिए ।

हुंकार

हुंकार का प्रकाशन 1938 में हुआ | हुंकार की कविताएँ मुख्य रूप से क्रांतिकारी भावों से परिपूर्ण राष्ट्रीय कविताएँ हैं | प्रो. कामेश्वर ने कहा – “रेणुका में अंगारों के ऊपर कोयले के नए टुकड़े पड़े थे, हुंकार में वे सभी आग हो गए” |

Hunkar

हुंकार कविता का एक अंश :- 

सिंह की हुंकार है हुंकार निर्भय वीर नर की।
सिंह जब वन में गरजता है,
जन्तुओं के शीश फट जाते,
प्राण लेकर भीत कुंजर भागता है।
योगियों में, पर, अभय आनन्द भर जाता,
सिंह जब उनके हृदय में नाद करता है।

रसवन्ती

रसवन्ती 1939 में प्रकाशित हुई | रसवन्ती की कविताओं में आप “रेणुका” और “हुंकार” के विपरीत सौंदर्य और प्रेम पायेंगे | इन कविताओं की रचना दिनकर जी बहुत ही प्रसन्नता के साथ की है | रसवन्ती की कविताओं में आप दिनकर की कल्पना में कोमलता पायेंगे |रसवन्ती दिनकर की आत्मा के करीब कविताओं में से एक थी

Rasvanti

रसवन्ती से सूखे विटप की सारिके कविता का एक अंश :-

मुझ में जलन है प्यास है, 
रस का नहीं आभास है, 
यह देख हँसती वल्लरी 
हँसता निखिल आकाश है। 
जग तो समझता है यही,
पाषाण में कुछ रस नहीं, 
पर, गिरि-हृदय में क्या न
व्याकुल निर्झरों का वास है ?

दवंद्वगीत

यहाँ  हृदय में उठने वाले दवंद्वों को रुबाइयों में बांधकर प्रस्तुत किया है, और यही उसकी नवीनता है | ईश्वर की सर्वव्यापकता और जीवन की नश्वरता के साथ सौंदर्य बोध का चित्रण इस रचना में हुआ है |

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द्वन्द्व गीत कविता का एक अंश:-

हम पर्वत पर की पुकार हैं,
वे घाटी के वासी हैं;
वन में ही वे गृही और 
हम गृह में भी संन्यासी हैं।
वे लेते कर बन्द खिड़कियाँ
डर कर तेज हवाओं से;
झंझाओं में पंख खोल
उड़ने के हम अभ्यासी हैं।

कुरुक्षेत्र

कुरुक्षेत्र का प्रकाशन 1946 में हुआ | यह आधुनिक हिंदी का सर्वप्रथम हिंदी काव्य है | यहाँ दिनकर जी ने महाभारत के कुरुक्षेत्र का वर्णन और युद्ध के औचित्य व अनौचित्य को विस्तार से समझाया | दिनकर युद्ध की आलोचना भी करते हैं तो यह भी बताते हैं की युद्ध कब जरुरी हो जाता है|

Kurukshetra

कुरुक्षेत्र के प्रथम सर्ग से कविता का एक अंश :-

आ गये हम पार, तुम उस पार हो;
यह पराजय या कि जय किसकी हुई ?
व्यंग्य, पश्चाताप, अन्तर्दाह का
अब विजय-उपहार भोगो चैन से।

रश्मिरथी

रश्मिरथी का प्रकाशन 1951 में हुआ | रश्मिरथी दिनकर की सबसे प्रशंसित रचनाओं में से एक है | यह कर्ण के जीवन के आस-पास केंद्रित है | रश्मिरथी की रचना कुरुक्षेत्र के पूरक के रूप में भी की गयी | जहाँ दिनकर ने कुरुक्षेत्र में न्याय और सत्य को अनिवार्य बताया वहीं रश्मिरथी को जातिवाद के निराकरण के लिए अवश्य बताया | यह कर्ण के यशोगान से ओजस्वी कविता है |

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रश्मिरथी से कविता का एक अंश :-

हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

उर्वशी

उर्वशी का प्रकाशन 1961 में हुआ | उर्वशी और राजा पुरुखा के प्रेम की कथावस्तु को लेकर इस काव्य की रचना की गई है | उर्वशी प्रेमकाव्य कोटि में आती है | दिनकर जी को इस काव्य के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरुस्कार मिला |

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उर्वशी  से कविता का एक अंश :-

जब से हम-तुम मिले, न जानें, कितने अभिसारों में
रजनी कर श्रृंगार सितासित नभ में घूम चुकी है;
जानें, कितनी बार चन्द्रमा को, बारी-बारी से,
अमा चुरा ले गयी और फिर ज्योत्सना ले आई है ।
जब से हम-तुम मिले, रूप के अगम, फुल कानन में
अनिमिष मेरी दृष्टि किसी विस्मय में ड़ूब गयी है,
अर्थ नहीं सूझता मुझे अपनी ही विकल गिरा का;
शब्दों से बनाती हैं जो मूर्त्तियां, तुम्हारे दृग से ।
उठने वाले क्षीर-ज्वार में गल कर खो जाती हैं ।
खड़ा सिहरता रहता मैं आनंद-विकल उस तरु-सा
जिसकी डालों पर प्रसन्न गिलहरियाँ किलक रही हों,
या पत्तों में छिपी हुई कोयल कूजन करती हो ।

संस्कृति के चार अध्याय

sanskriti ke char adhyaay

वैसे तो दिनकर अपने पद्य को लेकर ही प्रचलित थे मगर ये गद्य उन्होंने बड़ा ही अनूठा लिखा | यह बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसका लेखन दिनकर ने गहन अध्यन के बाद किया | भारतीय संस्कृति के विकास और उससे बनने वाली अंतरधाराओं का परिचय देने वाली इससे अच्छी पुस्तक नहीं है | दिनकर ने स्वयं इस पुस्तक में लिखा है की उनकी इस रचना को जरूर पढ़ा जाए | 

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