अमृता प्रीतम की कहानी उनकी किताबों की जुबानी

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Amrita-pritam

अमृता प्रीतम, ऐसी लेखिका जिन्होंने अपने लेखन तथा जीवन से प्रेम को नई तरह से परिभाषित किया | पुरुष प्रधान समाज में यह पहली लेखिका थी, जिन्हे वर्ष 1956 में साहित्य अकादमी पुरुष्कार से नवाज़ा गया | इनका लेखन अनूठा था, उन्होंने अपनी अनुभूतियों को अपनी रचनाओं में पारदर्शिता के साथ लिखा |

अमृता ने विवादास्पद, अध्यात्म गुरु आचार्य रजनीश की विचारधारा का समर्थन ही नहीं, बल्कि उसे आत्मसात कर अपनी अभिव्यक्तियों में प्रसारित भी किया |आचार्य रजनीश की अनुयायी भी रही तथा उनकी कुछ पुस्तकों की भूमिका भी लिखी|उन्होंने आचार्य रजनीश के संस्मरणों पर एक पुस्तक भी लिखी जिसका शीर्षक “मन मिर्ज़ा तन साहिबा” है|

अमृता साहसी लेखिका होने के साथ ही, एक निर्भीक महिला भी थी| जहाँ पितृसत्ता समाज में इनके पति प्रीतम से तलाक लेना एक बड़ी बात थी, वहीं साहिर व इमरोज़ से अपने प्रेम संबंधों को निर्विरोध स्वीकार किया | उन्होंने अपने लेखन में प्रेम से आध्यात्म को जोड़ते हुए, एक नए साहित्य को दिशा दी |  

अमृता प्रीतम  ने जीवन की हर घटना को बड़ी ही सहजता के साथ सबके सामने अपनी रचनाओं के माध्यम से रखा, तो आइए अमृता जी को उनकी किताबों की जुबानी ही जानें :-

रसीदी टिकट

रसीदी टिकट इनकी आत्मकथा का पहला भाग है| अमृता जानती थीं कि उनके मुक्त व स्वतंत्र व्यक्तित्व को पुरातनपंथी समाज पचा नहीं सकेगा| लेकिन फिर भी उन्होंने स्वयं को सीमाओं में बांधना स्वीकार नहीं किया। बड़ी बेबाकी से समाज की परवाह किए बिना ‘रसीदी टिकट’ में उन्होंने अपने जीवन का सार लिखा है।
इसकी शुरुआत इनके बचपन से बहुत वर्षों पहले से ही हो जाती है, जहाँ उन्होंने अपने माता-पिता के मिलन की कहानी और उससे पहले की कहानी का जिक्र भी किया है | यहाँ इन्होनें अपने जीवन के किस्से कुछ अनोखे तरीके से पेश किये हैं | जहाँ अमृता जी ने हिंदू-मुस्लिम की एकता को गिलासों से जोड़ते हुए अपनी ही नानी से विद्रोह किया और बाद में सफल भी हुई |

इसी किताब में वो अपने और साहिर के प्रेम का जिक्र भी करती हैं | शायर और फिल्म गीतकार साहिर लुधियानवी और पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम की प्रेम कहानी भारतीय साहित्य इतिहास की महान प्रेम कथाओं में से एक है। दोनों ने बहुत कम वक़्त एक साथ गुजारा। वो जब मिलते थे, तो बहुत कम बातें करते थे। लेकिन साहित्यिक इलाकों में उनके प्यार की बातें अक्सर होती रहती थीं। साहिर जब अमृता से पहली बार मिले तो वो शादीशुदा थीं। दोनों की मुलाकात की वजह भी साहित्य ही था। बात 1944 की है। अमृता एक मुशायरे में शिरकत कर रही थीं। साहिर पर अमृता की पहली नजर भी इसी मुशायरे में पड़ी थी। अमृता, साहिर की शख्सियत के बारे में जानकर दिल को उस ओर झुकने से रोक न सकीं। अमृता का दीवाना प्रेम उस महफ़िल से ही साहिर की इबादत करने लगा था। वो लिखती हैं मुझे नहीं मालूम कि साहिर के लफ़्जों की जादूगरी थी या उनकी ख़ामोश नजर का कमाल, लेकिन कुछ तो था जिसने मुझे अपनी तरफ खींच लिया। साहिर से मिलने के बाद अमृता ने दिल में प्यार के फूल को खिलते महसूस किया। उन्हें लगा कि यह ईश्वर की ही योजना है, जिसमें किस्मत का हाथ था।
उस मुशायरे की रात को याद करते हुए लिखती हैं, आज जब मुड़कर देखती हूं तो ऐसा समझ आता है कि तकदीर ने मेरे दिल में इशक़ का बीज डाला, जिसे बारिश की फुहारों ने बढ़ा दिया। यहाँ अमृता इस ख़ामोशी से बढ़ते मोहब्बत के जिक्र में लिखती हैं, जब साहिर मुझसे मिलने लाहौर आते, वो हमारे दरम्यान रिश्ते का विस्तार बन जाता। मेरी खामोशी का फैलाव हो जाता।

ऐसे जैसे मेरी बगल वाली कुर्सी पर आकर वो चुपचाप चले गए हों। वो आहिस्ता से सिगरेट जलाते, थोड़ा कश लेकर उसे आधी छोड़ देते। जली सिगरेट को बीच में छोड़ देने की आदत-सी थी साहिर में। अधजली सिगरेट को रखकर नई जला देते थे, जैसे हमेशा कुछ बेहतर तलाश रहे हो। कभी… एक बार उनके हाथ को छूना चाहती थी, पर मेरे सामने मेरे ही| संस्कारों की एक वह दूरी थी, जो तय नहीं होती थी | साहिर की अधूरी सिगरेट को संभालकर रखना सीख लिया था मैंने।अकेलेपन में यही मेरी साथी थी। उन्हें उंगलियों में थामना मानो साहिर का हाथ थामना था। उनकी छुअन को महसूस करनाथा। सिगरेट की लत मुझे ऐसे ही लगी।

अक्षरों के सायें

यह इनकी आत्मकथा का दूसरा भाग है जिसे अमृता जी ने रसीदी टिकट के २० वर्षों के बाद लिखा | यहाँ उनके जीवन समग्र के कुछ नए और पुराने पहलू हैं, जिन्हें अमृता जी ने कथावृत्त किया है | यह आत्मकथा ही नहीं बल्कि एक बिलकुल नये अध्यात्म से जुड़े धरातल पर उसका विवरण प्रस्तुत करती है | यहाँ अमृता जी ने अपने जीवन की सभी अनुभूतियों को किसी न किसी अक्षरों के तले जिया है | यह साहित्य की एक विशिष्ट रोमांचक आत्मकथा है |

किताब का एक प्रसंग :-

मैं पैदा हुई, तो घर की दीवारों पर मौत के साये उतरे हुए थे। मैं मुश्किल से तीन बरस की थी, जब घुटनों के बल चलता हुआ मेरा छोटा भाई नहीं रहा। और जब में पूरे ग्यारह बरस की भी नहीं थी, तब माँ नहीं रही। और फिर मेरे जिस पिता ने मेरे हाथ में कलम दी थी, वे भी नहीं रहे। और मैं इस अजनबी दुनिया में अकेली खड़ी थी अपना कहने को कोई नहीं था। समझ में नहीं आता था कि जमीन की मिट्टी ने अगर देना नहीं था, तो फिर वह एक भाई क्यों दिया था? शायद गलती से, कि उसे जल्दी से वापस ले लिया। और कहते हैं कि माँ  ने कई मन्नतें मानकर मुझे पाया या, पर मेरी समझ में नहीं आता या कि उसने कैसी मन्नतें मानी और कैसी मुराद पाई? उसे किस लिए पाना था अगर इतनी जल्दी उसे धरती पर अकेले छोड़ देना था?
लगता-जब मैं मां की कोख से आग की लपट-सी पैदा हुई तो जरूर एक साया होगा, जिसने मुझे गाढ़े धुएंकी घुट्टी दी होगी। बहुत बाद में, उल्का लफ़्ज सुना, तब अहसास हुआ कि सूरज के आसपास रहने वाली उल्का पट्टी से मैं आग के एक शोले की तरह गिरी थी और अब इस शोले केराख होने तक जीना होगा।

ख़तों का सफ़रनामा

यह इमरोज़ और अमृता प्रीतम के बीच इन दो बेहद रचनात्मक लोगों के प्रेम-पत्रों का संग्रह है, जो उनके रिश्ते और व्यक्तित्व के अंतरंग चित्र को चित्रित करने का काम करते हैं। उनके पत्र जीवन में उस समाज की तस्वीर भी दिखातें हैं जिसमें वे रहते थे | 

अमृता का अपने से सात साल छोटे इमरोज से प्यार का सिलसिला शुरू हुआ। 1957 में अमृता ने एक पत्रकार से अपनी किताब ‘आखिरी खत’ का कवर डिजाइन करने का अनुरोध किया था चित्रकार ने कहा कि, एक ऐसे व्यक्ति को जानते हैं, जो यह काम उनसे बेहतर व सकता है। उनके कहने पर अमृता ने इमरोज को अपने पास बुलाया। इमरोज ने उनके कहने पर इस किताब का कवर डिजाइन  तैयार किया। अमृता को डिजाइन भी पसंद आया और आर्टिस्ट भी। यही से इन दोनों का मिलना-जुलना शुरू हुआ | 

अमृता और इमरोज़ का प्रेम भी अनूठा ही था, एक ही घर में रहते हुए दोनों अलग अलग कमरों में रहते थे | इमरोज़ नौकरी करने के लिए बम्बई भी गए लेकिन अमृता का प्रेम उन्हें वापस खिंच लाया तथा इनका सफ़र आखिरी तक रहा|

पिंजर

यह उपन्यास विभाजन के समय अमृता ने लिखा, विभाजन से पहले अमृता लाहौर रहती थी, उसके बाद दिल्ली आ गई |   
यह पुस्तक उस समय की महिलाओं की विकट स्थिति का एक अनूठा रूप है। यहाँ अमृता अपने हर किरदार में एक जीवंत आत्मा रखती हैं।  ‘पिंजर’ का अर्थ है ‘कंकाल’। न कंकाल, न चेहरा, न मन, न इच्छा, न पहचान। पिंजर ब्रिटिश शासन से भारत की स्वतंत्रता के युग में स्थापित किया गया है, विशेष रूप से, उस समय जब देश का विभाजन किया जा रहा था । इस समय के दौरान महिलाओं की पीड़ा, कष्ट, बलिदान और दुख पिंजर में वर्णित हैं|  नायिका वर्तमान को गले लगाती है और लोगों के गलत कामों को क्षमा कर देती है; वह भविष्य की अनंत संभावनाओं को तलाशने के लिए फिर से उठती है। 

मन मिर्ज़ा तन साहिबा

अमृता प्रीतम जी ने अपनी इस किताब “मन मिर्ज़ा तन साहिबा” को पूर्णतः रजनीश जी को समर्पित किया है।उनके लफ्ज़ कभी ख्यालों के पैरों में पायल से बजते हैं तो कभी ज़िंदगी से थके हुए यात्री को हौंसला देते हैं। यह किताब अंतरचेतना को संगति प्रदान करती प्रतीत होती है।

अमृता जी कहती हैं “ मिर्ज़ा एक मन है जो साहिबा के तन में बसता है और जो यह अनुभव कर सका वही मुहब्बत के आलम को समझ सकता है। साहिबा व मिर्ज़ा के बदन उस पाक मस्ज़िद से हो गए हैं जहां पाँच नमाज़े बस्ता लेकर मोहब्बत की तालीम पाने आती हैं।“

वजूद की गहराई तक उतरती इस किताब में अमृता जी ने अपनी कुछ एक नज़्में भी पिरोयी हैं-
1 .
अनुभव एक है असीम का – अनंत का,
पर एक रास्ता तर्क का है
जहां वह कदम कदम साथ चलता है,
और एक रास्ता वह है जहां तर्क एक ओर खड़ा देखता रह जाता है॥

2.
जाने कितनी खामोशियाँ हैं
जो हमसे आवाज मांगती हैं
और जाने कितने गुमनाम चेहरे हैं
जो हमसे पहचान मांगते हैं॥

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