आत्मकथाएँ पढ़ने के शौक़ीन है तो, इन हिंदी की बेहतरीन लेखिकाओं की आत्मकथा जरूर पढ़े |

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आत्मकथा साहित्य की एक लोकप्रिय विधा है | आत्मकथा के दो मुख्य तत्व “आत्म” व “कथा” है | यानि जीवन जैसे जिया उसे अपने शब्दों में लिखा | जीवनशैली को अभिव्यक्त करने का सबसे अच्छा तरीका है आत्मकथा |

वर्तमान में हिंद आत्मकथाएँ पाठकों द्वारा खूब पढ़ी और सराही भी जा रही है | इसिलए इस ब्लॉग के माध्यम से हम कुछ हिंदी की बेहतरीन लेखिकाओं की आत्मकथाएँ आपके समक्ष लेकर आए हैं | जिन लेखिकाओं की आत्मकथा के बारें हम आपको बता रहें है, उन्हें आज भी पढ़ना उतना ही प्रासंगिक है क्योंकि यह आत्मकथाएँ हमें सामाजिक ढांचे की जड़ता और अपर्याप्तता को समझने में अच्छे से सहायता करती हैं |

इन लेखिकाओं ने अपनी आत्मकथा में अपने अपने समय के परिवेश और संस्कृतियों का मूल्यांकन पूर्वाग़ृह रहित होकर किया है | साथ ही साथ सामाजिक, आर्थिक, व राजनैतिक चेतना और उस समय की रीती-कुरीतियों को भी दर्शाया है | इन कथाकारों ने अपनी कृतियों के माध्यम से चिंतनशील समाज को दिशा निर्देश देने का भी काम किया है | 

इन्हे पढ़ना इसलिए जरुरी हो जाता है क्योकिं यह आत्मकथाएँ समाज और जीवन का अन्वेषण करती है | जब-जब ये आत्मकथाएँ  प्रकाशित हुई, तब-तब समाज और साहित्य में खलबली सी मची है | इनपर सवाल भी उठे है और एक अलग नज़रिये से भी देखा गया है | क्योंकि इन स्त्री आत्मकथाओं ने तथाकथित विकसित और सभ्य समाज की संस्कृति में छुपी हुई क्रूरता और उत्पीड़न के काफी बड़े रहस्य उजागर किये हैं | इन  आत्मकथाओं ने समाज की विषमतओं और विडंबनाओं को सामने लाने का काम भी किया हैं |
यह आत्मकथाएँ आज पढ़ना उतनी ही प्रासंगिक है जीतनी जब ये लिखी गयी थी |

अन्या से अनन्या – प्रभा खेतान 

Anya Se Ananya

अन्या से अनन्या पितृसत्ता और सामंती समाज में एक साहसी स्त्री के संकल्प की कथा है, जहाँ एक स्त्री ने समाज की सभी रूढ़िवादी परम्परओं को तोड़ा और  बिना विचलित हुए अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रही |  यहाँ लेखिका ने अपने समय के  धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश भी दर्शाया है | उन्होंने प्रेम भी किया और उस पर आश्रित भी नहीं रही | खुद एक व्यापारिक परिवार से होने के बाद भी अपना व्यवसाय कैसे अलग से बनाया और उसमे सफलता  की  | प्रभा खेतान की आत्मकथा अन्या से अनन्या एक बेबाक, वज्राहीन और उत्तेजक आत्मकथा है | यह कथा उनके संघर्ष और सफलता के प्रेरणा के रूप में हैं | 

एक कहानी यह भी – मन्नू भंडारी 

Ek Kahani Yah Bhi

एक कहानी यह भी, मन्नू भंडारी जी की आत्मकथ्यात्मक पुस्तक है जिसे आपने अपनी ‘लेखकीय आत्मकथा’ कहा है। इनकी आत्मकथा में शहरी परिवेश व वातावरण का चित्रण देखने को मिलता है | इनकी आत्मकथा में लोकजीवन सबसे सजीव और यथार्थ के करीब है, क्योंकि लेखिका ने अपनी लेखनी और साहित्य के आलावा अपने जीवन की निजी अनुभूतियों भी दर्शाया है | लेखन के चलते कैसे उनका जानेमाने लेखक राजेंद्र यादव से मिलन हुआ और बाद में विवाह भी,  जीवन-संगिनी होने का रोमांच और एक जिद्‌दी पति की पत्नी होने की बाधाएँ | अपनी आत्मकथा में मन्नू जी ने रचनात्मक और समझ विकास के लिए अपने परिवार और मित्रों का संस्मरण किया हैं | उन्होंने अपनी अध्यापिका को जीवन को नई दिशा दर्शाने के लिए आभार भी प्रकट किया है |   

कस्तूरी कुंडल बसै – मैत्रेयी पुष्पा

kasturi kundal Base

कस्तूरी कुंडल बसै एक आत्मकथानक उपन्यास है जिसे लेखिका ने अपनी माँ कस्तूरी को केंद्र में रखकर लिखा है | अपनी आत्मकथा में लेखिका ने इसे कल्पना से बुनी एक स्त्री के आम से ख़ास बन जाने की कथा के रूप में पेश किया है | यह लेखिका और उनकी माँ की कथा है, उन्होंने बताया की कैसे जब जब वो अपने जीवन में नए आयाम छूने की कोशिश करती तब उनकी माँ ने जीवन की सच्चाइयों को प्रसंगो के माध्यम से समझाया | कस्तूरी कुंडल बसै में ग्रामीण परिवेश और सामाजिक जीवन का चित्रण अच्छे से किया गया है |

गुडिय़ा भीतर गुडिय़ा – मैत्रेयी पुष्पा

Gudiya Bhitar Gudiya

गुडिय़ा भीतर गुडिय़ा इनका दूसरा उपन्यास जो काफी बेबाकी से मैत्रेयी पुष्पा जी ने लिखा | यहाँ लेखिका ने शहरी परिवेश और वातावरण का चित्रण किया है | बड़ी ही सरलता के साथ लेखिका ने अपने प्रेम और निजी जीवन को लिखा है | गुडिय़ा भीतर गुडिय़ा एक स्त्री के अनेक परतीय व्यक्तित्व और एक लेखिका की ऐसी ईमानदार आत्म-स्वीकृतियाँ हैं जिनके साथ होना शायद हर पाठक की मजबूरी है | 

कागजी हैं पैराहन – इस्मत चुग़ताई

Kagaji Hai Pairahan

साहित्य जगत में इस्मत आपा  सबसे बेबाक, विद्रोहिणी और साहसी लेखिका रही हैं | कागजी है पैरहन में उन्होंने अपनी आत्मकथा को बहुत ही सहजता के साथ लिखा है|  कहने को ही यह पुस्तक आत्मकथा है । पढ़ने में यह बाकायदा उपन्यास और उपन्यास से भी ज़्यादा कुछ है । इस आत्मकथा में  इन्होने अपने समय और समाज का प्रामाणिक चित्रण और वर्णन बहुत ही अच्छे से किया है | आत्मकथा पढ़ने से मालूम होता है की कैसे तीस के दशक की  कुलीन मुस्लिम परिवार में एक लड़की के पढ़ने–लिखने में कितनी मुश्किलें आती है , लेकिन वहीं इस्मत आपा ने  अपने ज़िद्दी स्वभाव के चलते उन सब मुसीबतों को  कैसे किनारें भी कर दिया | ये मुश्किलें काग़जी है पैरहन की मुख्य कथावस्तु बनी हैं ।

खुद इस्मत आपा के शब्दों में:-
लिखते हुए मुझे ऐसा लगता है जैसे पढ़नेवाले मेरे सामने बैठे हैं, उनसे बातें कर रही हूँ और वो सुन रहे हैं । कुछ मेरे हमख़याल हैं, कुछ मोतरिज़ हैं, कुछ मुस्कुरा रहे हैं, कुछ गुस्सा हो रहे हैं । कुछ का वाक’ई जी जल रहा है । अब भी मैं लिखती हूँ तो यही एहसास छाया रहता है कि बातें कर रही हूँ ।   

रसीदी टिकट – अमृता प्रीतम

Raseedi Ticket

अमृता जी एक अलग दर्जे की लेखिका थी, इनका चिंतन-मनन, अनुभूतियाँ कुछ खास थी | रसीदी टिकट इनकी आत्मकथा का पहला भाग है जिसकी शुरुआत इनके बचपन से बहुत वर्षों पहले से ही हो जाती है, जहाँ इन्होने अपने माता-पिता के मिलन की कहानी और उससे पहले की कहानी का जिक्र भी किया है |यहाँ इन्होनें अपने जीवन के किस्से कुछ अनोखे तरीके से पेश किये हैं | जहाँ अमृता जी ने हिंदू-मुस्लिम की एकता को गिलासों से जोड़ते हुए अपनी ही नानी से विद्रोह किया और बाद में सफल भी हुई | इसी क्रम में कुछ खास :-
किस्से क्या यह कयामत का दिन है ?, उससे भी दस बरस पहले, यह एक वह पल है, परछाइयां |

अक्षरों के सायें – अमृता प्रीतम

Akshron ke_ Saaye

यह इनकी आत्मकथा का दूसरा भाग है जिसे अमृता जी ने रसीदी टिकट के २० वर्षों के बाद लिखा | यहाँ उनके जीवन समग्र के कुछ नए और पुराने पहलू हैं, जिन्हें अमृता जी ने कथावृत्त किया है | यह आत्मकथा ही नहीं बल्कि एक बिलकुल नये अध्यात्म से जुड़े धरातल पर उसका विवरण प्रस्तुत करती है | यहाँ अमृता जी ने अपने जीवन की सभी अनुभूतियों को किसी न किसी अक्षरों के तले जिया है | यह साहित्य की एक विशिष्ट रोमांचक आत्मकथा है |

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